पटना: 2015 का विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक था। 1994 के बाद पहली बार लालू यादव और नीतीश कुमार का मिलन हुआ और वे साथ मिल कर चुनाव लड़े। 2010 में जो लालू यादव तीसरे नम्बर की पार्टी बन कर हाशिये पर चले गये थे, उनकी राजनीति को ऐसा खाद पानी मिला कि वे 80 सीटें लेकर टॉप पर पहुंच गये। लालू यादव ने अपनी विरासत तेजस्वी यादव को सौंप कर राजद में नये अध्याय की शुरुआत की। भाजपा, जो नरेन्द्र मोदी के चमत्कार के भरोसे मैदान में उतरी थी, उसकी बुरी तरह हार हुई। चुनाव के नतीजे ने एक थ्योरी विकसित की- अगर नीतीश-लालू मिल जाएं तो बिहार में भाजपा की हार तय है। इस चुनाव का टर्निंग प्वाईंट क्या था ?
मोहन भागवत के बयान ने लिखी हार की पटकथा
सितम्बर 2015: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर को एक इंटरव्यू दिया था। उस समय गुजरात में पटेल समुदाय ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण के लिए आंदोलन चला रहा था। इस संबंध में मोहन भागवत ने इंटरव्यू में कहा था, 'आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए। इसके लिए एक गैरराजनीतिक समिति गठित की जाए जो यह जांच करें कि आरक्षण की और कितने समय तक जरूरत है।' मोहन भागवत के इस बयान का बिहार से कुछ लेना-देना नहीं था। लेकिन इसकी टाइमिंग गलत थी। बिहार में 12 अक्टूबर से पांच चरणों में विधानसभा चुनाव होना था। इसके ठीक पहले यह बयान आ गया। राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी लालू यादव की जैसे तो लॉटरी ही निकल पड़ी। उन्होंने हाथों-हाथ इस मुद्दे को लपक लिया। फिर इस मुद्दे को इतना भुनाया कि महागठबंधन की झोली वोटों से भर गयी। मोहन भागवत का यह बयान 2015 के चुनाव का वह टर्निंग प्वाईंट था जिसकी वजह से भाजपा की हार और महागठबंधन की जीत तय हुई।
'अगर माई का दूध पीया है तो खत्म कर के दिखाओ'
चुनाव में अगड़े-पिछड़े का माहौल बनाने के लिए लालू यादव ने मोहन भागवत के बयान को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया। मोहन भागवत ने केवल समीक्षा का व्यक्तिगत विचार प्रगट किया था। वह शासन से जुड़े कोई व्यक्ति भी नहीं थे। लेकिन लालू यादव ने प्रचार करना शुरू कर दिया कि संघ और भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहते हैं। भाजपा को आरक्षण विरोधी बता कर लालू यादव ने एनडीए पर हमला बोल दिया। लालू यादव ने 21 सितम्बर 2015 को ट्वीट (अब एक्स) किया 'तुम आरक्षण खत्म करने की बात करते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पीया है तो खत्म कर दिखाओ, किसकी कितनी ताकत है पता चल जाएगा।' इसके बाद लालू यादव ने एक और ट्वीट किया जिसमें उन्होंने नरेन्द्र मोदी को सीधे निशाना बनाया। उन्होंने लिखा, 'तथाकथित चाय बेचने वाले और हाल ही में पिछड़ा बने मोदी को बताना चाहिए कि क्या वह अपने आका भागवत के कहने पर आरक्षण खत्म कर देंगे ?'
दूसरे चरण के चुनाव के बाद ही तस्वीर साफ होने लगी थी
मोहन भागवत ने जब ये बात कही थी तब किसी को अंदजा नहीं था कि मामला इतना तूल पकड़ लेगा। लेकिन लालू यादव ने रोज-रोज भड़काऊ बयान दे कर आरक्षण के सवाल को सुलगता हुआ मुद्दा बना दिया। भाजपा ने मोहन भागवत के इस बयान से दूरी बनायी, सफाई दी लेकिन माहौल नहीं बदला। लालू यादव ने मंडलवाद के दौर को दुहराते हुए सभी पिछड़ों को एक कर दिया। वहीं एक भरी सभा में लालू प्रसाद यादव ने ये कह कर आग को और हवा दे दी कि 'ई बैकवर्ड वर्सेज फॉरवर्ड का लड़ाई है।' अल्पसंख्यक पहले से तैयार बैठे थे भाजपा को हराने के लिए। 12 और 17 अक्टूबर को जब दो चरण के मतदान सम्पन्न हो गये तो ये आभास मिल गया कि महागठबंधन, एनडीए से आगे निकल गया है। इसके बाद तीन चरणों का मतदान, दशहरा और मुहर्रम की छुट्टियों के बाद होना था। दशहरा के दिन संघ के कार्यक्रम में मोहन भागवत ने आरक्षण के समर्थन में बयान देकर स्थिति बदलनी चाही लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पिछड़ों की एकजुटता ने भाजपा की हार पक्की कर दी।
बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है
भाजपा की हार की एक और वजह थी। महागठबंधन के चुनावी रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर का आना, भाजपा पर भारी पड़ गया। हालांकि प्रशांत किशोर की सेवा मूल रूप से नीतीश कुमार ने ली थी लेकिन बाद में उन्होंने पूरे महागठबंधन के लिए चुनावी रणनीति तैयार की। प्रशांत किशोर ने एक नारा गढ़ा था- बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है। यह नारा इतना लोकप्रिय हुआ कि जन-जन की आवाज बन गया। इस नारे को गीत के रूप में ढाल कर मोबाइल टोन भी बनाया गया। शहर से लेकर गांव-देहात तक जब भी किसी मोबाइल की घंटी बजती- गाना गूंजने लगता- बिहार में बाहर है, नीतीशे कुमार है। प्रशांत किशोर ने पूरे बिहार में सर्वे कराया, उससे मिले फीडबैक के आधार पर नेताओं को टिकट दिये गये जिससे जिताऊ उम्मीदवारों का चयन हो सका। नेताओं के दौरे, उनका कार्यक्रम भी प्रशांत किशोर ने तय किये। प्रशांत किशोर ने हाल में इस बात का खुलासा किया है कि तेजस्वी यादव भी उनकी सहमति के बिना डिप्टी सीएम नहीं बन सकते थे। यहां कि तक कैबिनेट के मंत्रियों के चुनाव में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जिन नामों पर उन्होंने असहमति जतायी, वे मंत्री नहीं बन सके।
एनडीए बिना दूल्हे की बारात
एनडीए को इसलिए भी नुकसान हुआ क्यों कि वह बिना सीएम फेस के चुनाव में उतरा था। दूसरी तरफ महागठबंधन ने नीतीश कुमार को सीएम उम्मीवार घोषित कर चुनाव लड़ा था। जनता के सामने ये असमंजस था कि अगर वह एनडीए का समर्थन करती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा ? सीएम के सवाल पर एनडीए में खटपट होगी तो सरकार अस्थिर रहेगी। जब कि नीतीश कुमार को लेकर कोई संशय नहीं था। नीतीश कुमार जांचे-परखे मुख्यमंत्री थे। जनता ने अनिश्चित को छोड़ कर निश्चित को चुन लिया।
मोहन भागवत के बयान ने लिखी हार की पटकथा
सितम्बर 2015: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर को एक इंटरव्यू दिया था। उस समय गुजरात में पटेल समुदाय ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण के लिए आंदोलन चला रहा था। इस संबंध में मोहन भागवत ने इंटरव्यू में कहा था, 'आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए। इसके लिए एक गैरराजनीतिक समिति गठित की जाए जो यह जांच करें कि आरक्षण की और कितने समय तक जरूरत है।' मोहन भागवत के इस बयान का बिहार से कुछ लेना-देना नहीं था। लेकिन इसकी टाइमिंग गलत थी। बिहार में 12 अक्टूबर से पांच चरणों में विधानसभा चुनाव होना था। इसके ठीक पहले यह बयान आ गया। राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी लालू यादव की जैसे तो लॉटरी ही निकल पड़ी। उन्होंने हाथों-हाथ इस मुद्दे को लपक लिया। फिर इस मुद्दे को इतना भुनाया कि महागठबंधन की झोली वोटों से भर गयी। मोहन भागवत का यह बयान 2015 के चुनाव का वह टर्निंग प्वाईंट था जिसकी वजह से भाजपा की हार और महागठबंधन की जीत तय हुई।
'अगर माई का दूध पीया है तो खत्म कर के दिखाओ'
चुनाव में अगड़े-पिछड़े का माहौल बनाने के लिए लालू यादव ने मोहन भागवत के बयान को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया। मोहन भागवत ने केवल समीक्षा का व्यक्तिगत विचार प्रगट किया था। वह शासन से जुड़े कोई व्यक्ति भी नहीं थे। लेकिन लालू यादव ने प्रचार करना शुरू कर दिया कि संघ और भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहते हैं। भाजपा को आरक्षण विरोधी बता कर लालू यादव ने एनडीए पर हमला बोल दिया। लालू यादव ने 21 सितम्बर 2015 को ट्वीट (अब एक्स) किया 'तुम आरक्षण खत्म करने की बात करते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। माई का दूध पीया है तो खत्म कर दिखाओ, किसकी कितनी ताकत है पता चल जाएगा।' इसके बाद लालू यादव ने एक और ट्वीट किया जिसमें उन्होंने नरेन्द्र मोदी को सीधे निशाना बनाया। उन्होंने लिखा, 'तथाकथित चाय बेचने वाले और हाल ही में पिछड़ा बने मोदी को बताना चाहिए कि क्या वह अपने आका भागवत के कहने पर आरक्षण खत्म कर देंगे ?'
दूसरे चरण के चुनाव के बाद ही तस्वीर साफ होने लगी थी
मोहन भागवत ने जब ये बात कही थी तब किसी को अंदजा नहीं था कि मामला इतना तूल पकड़ लेगा। लेकिन लालू यादव ने रोज-रोज भड़काऊ बयान दे कर आरक्षण के सवाल को सुलगता हुआ मुद्दा बना दिया। भाजपा ने मोहन भागवत के इस बयान से दूरी बनायी, सफाई दी लेकिन माहौल नहीं बदला। लालू यादव ने मंडलवाद के दौर को दुहराते हुए सभी पिछड़ों को एक कर दिया। वहीं एक भरी सभा में लालू प्रसाद यादव ने ये कह कर आग को और हवा दे दी कि 'ई बैकवर्ड वर्सेज फॉरवर्ड का लड़ाई है।' अल्पसंख्यक पहले से तैयार बैठे थे भाजपा को हराने के लिए। 12 और 17 अक्टूबर को जब दो चरण के मतदान सम्पन्न हो गये तो ये आभास मिल गया कि महागठबंधन, एनडीए से आगे निकल गया है। इसके बाद तीन चरणों का मतदान, दशहरा और मुहर्रम की छुट्टियों के बाद होना था। दशहरा के दिन संघ के कार्यक्रम में मोहन भागवत ने आरक्षण के समर्थन में बयान देकर स्थिति बदलनी चाही लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पिछड़ों की एकजुटता ने भाजपा की हार पक्की कर दी।
बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है
भाजपा की हार की एक और वजह थी। महागठबंधन के चुनावी रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर का आना, भाजपा पर भारी पड़ गया। हालांकि प्रशांत किशोर की सेवा मूल रूप से नीतीश कुमार ने ली थी लेकिन बाद में उन्होंने पूरे महागठबंधन के लिए चुनावी रणनीति तैयार की। प्रशांत किशोर ने एक नारा गढ़ा था- बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है। यह नारा इतना लोकप्रिय हुआ कि जन-जन की आवाज बन गया। इस नारे को गीत के रूप में ढाल कर मोबाइल टोन भी बनाया गया। शहर से लेकर गांव-देहात तक जब भी किसी मोबाइल की घंटी बजती- गाना गूंजने लगता- बिहार में बाहर है, नीतीशे कुमार है। प्रशांत किशोर ने पूरे बिहार में सर्वे कराया, उससे मिले फीडबैक के आधार पर नेताओं को टिकट दिये गये जिससे जिताऊ उम्मीदवारों का चयन हो सका। नेताओं के दौरे, उनका कार्यक्रम भी प्रशांत किशोर ने तय किये। प्रशांत किशोर ने हाल में इस बात का खुलासा किया है कि तेजस्वी यादव भी उनकी सहमति के बिना डिप्टी सीएम नहीं बन सकते थे। यहां कि तक कैबिनेट के मंत्रियों के चुनाव में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जिन नामों पर उन्होंने असहमति जतायी, वे मंत्री नहीं बन सके।
एनडीए बिना दूल्हे की बारात
एनडीए को इसलिए भी नुकसान हुआ क्यों कि वह बिना सीएम फेस के चुनाव में उतरा था। दूसरी तरफ महागठबंधन ने नीतीश कुमार को सीएम उम्मीवार घोषित कर चुनाव लड़ा था। जनता के सामने ये असमंजस था कि अगर वह एनडीए का समर्थन करती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा ? सीएम के सवाल पर एनडीए में खटपट होगी तो सरकार अस्थिर रहेगी। जब कि नीतीश कुमार को लेकर कोई संशय नहीं था। नीतीश कुमार जांचे-परखे मुख्यमंत्री थे। जनता ने अनिश्चित को छोड़ कर निश्चित को चुन लिया।
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