नई दिल्ली/नागपुर: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2007 के एक हत्या मामले में दोषी करार दिए गए पूर्व डॉन से विधायक बने अरुण गवली को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि गवली और उनके साथियों को लगभग 17 साल से जेल में बंद रखा गया है, जबकि उनकी अपीलें अब तक सुनवाई की प्रतीक्षा कर रही हैं। 76 वर्षीय गवली फिलहाल नागपुर सेंट्रल जेल में सजा काट रहे हैं और अगले सप्ताह औपचारिक आदेश सत्र अदालत (मुंबई) तक पहुंचने के बाद उनकी रिहाई संभव होगी। नागपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक वैभव एज ने कहा कि उन्हें तभी रिहा किया जाएगा जब सत्र अदालत को सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्राप्त होगा और वह आगे की प्रक्रिया पूरी करेगी।
कोर्ट ने सुनाया ये फैसला
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने यह जमानत आदेश दिया। सुनवाई के दौरान गवली की ओर से पेश अधिवक्ता मकरंद अदकर ने तर्क दिया कि अपीलों पर सुनवाई में असाधारण देरी हो रही है और इतने लंबे समय तक कारावास न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए गवली और अन्य सह-आरोपियों को राहत दी। ध्यान देने योग्य है कि पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और अरविंद कुमार की अगुवाई में गवली की जमानत अर्जी खारिज कर चुकी थी। तब कहा गया था कि अपील लंबित रहने तक उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती। मगर ताज़ा आदेश ने उस रुख को बदल दिया।
अच्छा आचरण बना आधार
गवली के वकील मीर नगमान अली ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल ने पिछली बार जब भी परोल या फरलो पर बाहर आने का अवसर पाया, सभी शर्तों का पालन किया। उनका आचरण हमेशा नियमों के अनुरूप रहा, जो यह दर्शाता है कि वह रिहाई के बाद भी अदालत की सभी शर्तों का पालन करेंगे। बता दें कि गवली को 2012 में एक सत्र अदालत ने शिवसेना नगरसेवक कमलाकर जामसंदेकर की हत्या के मामले में दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। तब से वह लगातार जेल में हैं।
कोर्ट ने सुनाया ये फैसला
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने यह जमानत आदेश दिया। सुनवाई के दौरान गवली की ओर से पेश अधिवक्ता मकरंद अदकर ने तर्क दिया कि अपीलों पर सुनवाई में असाधारण देरी हो रही है और इतने लंबे समय तक कारावास न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए गवली और अन्य सह-आरोपियों को राहत दी। ध्यान देने योग्य है कि पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और अरविंद कुमार की अगुवाई में गवली की जमानत अर्जी खारिज कर चुकी थी। तब कहा गया था कि अपील लंबित रहने तक उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती। मगर ताज़ा आदेश ने उस रुख को बदल दिया।
अच्छा आचरण बना आधार
गवली के वकील मीर नगमान अली ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल ने पिछली बार जब भी परोल या फरलो पर बाहर आने का अवसर पाया, सभी शर्तों का पालन किया। उनका आचरण हमेशा नियमों के अनुरूप रहा, जो यह दर्शाता है कि वह रिहाई के बाद भी अदालत की सभी शर्तों का पालन करेंगे। बता दें कि गवली को 2012 में एक सत्र अदालत ने शिवसेना नगरसेवक कमलाकर जामसंदेकर की हत्या के मामले में दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। तब से वह लगातार जेल में हैं।
You may also like
अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स सप्लायर समेत पांच गिरफ्तार, ड्रग्स व हथियार बरामद
मुख्यमंत्री ने की हर महीने 100 आयुष्मान आरोग्य मंदिर खोलने की घोषणा
कांगड़ा में अगले दो दिनों के लिए बारिश का ऑरेंज अलर्ट, पुलिस प्रशासन ने जारी की एडवाइजरी
राष्ट्रीय खेल दिवस: सुंदरनगर होस्टल और एमएलएसएम सुंदरनगर की टीमों ने जीता हॉकी खिताब
मलबे में दबी एक महिला का शव बरामद, दूसरी लापता